ज्योतिष-रोग एवं उपचार

ज्योतिष-विज्ञान और चिकित्सा-शास्त्रका सम्बन्ध प्राचीन काल से रहा है | पूर्वकालमें एक सुयोग्य चिकित्सकके लिये ज्योतिष-विषयका ज्ञाता होना अनिवार्य था| इससे रोग- निदान में सरलता होती थी | यघपि कुछ दशक पूर्वतक विदेशी प्रभावके कारण हमारे ज्योतिष-ज्ञानपर कड़ी और भ्रामक आलोचनाओका कोहरा छाया था तथा इसे बड़ी हेय द्रष्ठीसे देखा जाता था, तथापि सोभाग्यसे इधर कुछ समयसे लोगोंका विश्वास तथा आक   इस विषयपर पुन: बढता नजर आ रहा है |

ज्योतिष-शास्त्रके द्वारा रोगकी प्रकृति, रोगका प्रभाव, रोगका निदान और साथ ही रोगके प्रकट होनेकी अवधि तथा कारणोंका भलीभाती विशलेषण किया जा सकता है | यघपि आजकल चिकित्सा-विज्ञानने बहुत उत्रती कर ली है तथा कई आधुनिक और उत्रत प्रकारके चिकित्सीय उपकरणोंद्वारा रोग्की पहचान  सू   से हो भी जाती है , परन्तु कई बार देखने में आता है कि जहाँ इन उत्रत उपकरणोंद्वारा रोगकी पहचानका सटीक निष्कर्ष नही निकल पाता है , वहीं रोगिका स्वास्थ, धन, समय आदिका व्यर्थ-व्यय क्लेशकारक भी हो जाता है | अत: ऐसेमें जो बात रह जाती है वह है देवव्यपाक्षय-चिकित्सा | किसी विद्वान् देवज्ञके विशलेषण एवं उचित परामर्शद्वारा न केवल सिथती स्पष्ट होती है , अपितु कई बार अत्यन्त सहजतासे रोग दूर हो जाता है | इस  से  एक कुशल ज्योतिषी चिकित्सविद्र तथा रोगी दोनोंके लिये मार्गदर्शक बन सकता है |

ज्योतिष-विज्ञानमें किसी भी विषयके परिज्ञानके लिये जन्म-चक्रके तीनबिन्दुओ-लग्न, सूर्य तथा चन्द्रका अलग-अलग और परस्पर एक-दूसरेसे  अन्त:सम्बन्धोका विशलेषण मुख्य होता है | लग्न जहाँ बाहरी शरीरका , बाहरी व्यक्तित्वका दर्पण होता है , वही सूर्य आत्मिक शारीर , इच्छा-शक्ति  , तेज एवं ओजका प्रतिक होता है | चन्द्रमाका सम्बन्ध हमारे मानसिक व्यक्तिव्त, भावनाओ तथासंवेदनाओंसे होता है | सामान्य रूपसे यह समझा जा सकता है की लग्न मस्तिष्कका , चन्द्र मन, उदर और इन्द्रियोंका तथा सूर्यआत्मस्वरूप एवं हृदयका प्रतिनिधित्व करता है |

सामान्य रुपमें हम राशियों और ग्रहोंके अन्त:सम्बन्धको इस तरह समझ सकते है कि राशियाँ जैसे अलग-अलग आक्रतियोवाले पात्र हों और ग्रह अलग-अलग प्रकृतिके  पदार्थ तो जैसी प्रकृतिके पदार्थको जैसी आक्रतिके पात्रमें डाला जायगा, वह तदनुरूप आचरण करेगा और वेसा ही फल भी देगा |

  राशियों सम्बन्धित रोग एवं —– 

विविध राशियों, भावोंके द्वारा हमारे किन-किन —-

बोध होता है और किस प्रकारके रोग इनके द्वारा संभावित है , सर्वप्रथम इसपर सं—  चर्चा अग्र सार    ‘क’ में —–      है –

 

सारणी ‘क’ राशियों से सम्बन्धित रोग एवं अंग

भाव      राशी        तत्त्व            अन्ग                                  सम्भावित रोग

प्रथम         मेष            अग्नि            पिटयूटरी ग्लैंड, पाइनीअल ग्लैड         मस्तिष्क-रोग, विकार,सिरदर्द,

,सिर, दिमाग,ऊपरी जबड़ा |              मलेरिया,रक्तघात,नेत्ररोग,पाइरिया,

मुँहासे,चेचक,उन्माद,चक्कर-मिरगी आदि |

दिर्तीय       वृष            पृथ्वी          थायराइड, गला,जीभ, नाक,             गलगणड,मोटापा,फोड़ा-फुंसी,मघ-सेवन,

आवाज, चेहरा,निचला जबड़ा |          नेत्र-दोष,मुखपक्षाघात,मसूड़ेकी सूजन |

तृतीय       मिथुन         वायु            फेफड़ा,ऊपरी पसली,कन्धे,कान,         मानसिक असंतुलन,रोगभ्र्मी,कन्धेकी जक

हाथ-बाजू,स्वरयन्त्र,कोशिकाएँ |         ड़न,बाजुकी नसका दर्द,नकसीर,बोकाइटीस|

चतुर्थ       कर्क            जल             थाइमस ग्लैंड,नीचेकी पसली,            अपच, उदर और पाचन-सम्बन्धी रोग, कफ

फेफड़ा, स्तन, उदर |                        गैस-विकार, जलोदर, कैंसर, वातरोग |

पञ्चम      सिहं            अग्नि           ह्दय,पीठ,कोख,कमर, रक्त                 ह्दयरोग, पीलिया,बुखार, तीव्र-कम धडकन

तिल्ली, पिताश्य |                            ,नेत्ररोग,कटीवेदना,चेचक,चलनविभ्रम |

षष्ठ         कन्या          पृथ्वी          नाभिचक्र, कमर,  आंत |                     ऐठन, शोथ,दस्त,हैजा,आमाशय में घाव,

मलद्वार-कष्ट,अर्थराईटिस |

सप्तम       तुला          वायु            गुर्दे,मूत्राशय,वसित,मूत्रवाहिनी,          कमर-दर्द,मधुमेह, रीड्की हडडीका दर्द,

नलिकाए, गर्भाशय |                         गुर्दे-मूत्राशयरोग, पथरी |

अष्ठम      वृश्चिक        जल            मलद्वार,मलाशय,योनि,प्रोस्टेट,            बवासीर,नासूर,पथरी,रतिरोग,विचित्र

अण्डकोष,गर्भशय |                          कठिन रोग, कैंसर,हर्निया |

नवम       धनु           अग्नि            जंघा, नितम्ब |                               साइटिका,रक्त-विकार,चोट,घाव |

दशम      मकर          पृथ्वी          घुटने,जोड़,त्वचा,बाल,नाख़ून |            घुटने,जोडोका दर्द,चमड़ीके रोग,मिरगी

हाथीपाँव, गठिया |

एकादस     कुम्भ       वायु           पाँव,कान,साँस,गल्फ, एड़ी |                पागलपन, हृदयरोग,रक्त-विकार |

द्राद्र्श       मीन        जल             तलवा,पाँव,दांत |                             गोखरू,फोड़ा,टी.बी,ट्यूमर,कफदोष,पैरका

लकवा,पैर,एड़ीका दर्द |

 

 

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